Friday, 13 August 2010

फ़िर सभी पापी हृदय से, पाप तरना चाहिये
फ़िर नये आकाश से, गंगा उतरनी चाहिए ।।

कई युगों से क्षितिज का, एहसान बाकि है अभी
अब ज़मीं पर स्वर्ग को, नीचे उतरना चाहिये ।।

फ़िर सुनहरे पृष्ठ पर, भगवान का गुणगान हो
अब कोई गीता सी फ़िर, वाणी उपजनी चाहिये ।।

कलयुगी दानव प्रबल हो, कर रहे संहार हैं
कृष्ण के जैसा कोई, अवतार होना चाहि ।।

रोशनी अब खो गई, नभ के सितारों की कहीं
अब तिमिर में दीपों को जल जगमगाना चाहिये ।।

अब कहाँ सुर की हैं लहरें , कौन गाये लोरियाँ
अब तो बस मेंघों को मिल , मल्हार गाना चाहिये ।।

प्रीत की गंगा समर्पण मांगती है अब यहाँ
फिर बने मीरा कोई , श्याम सी प्रीत मिलना चाहिये ।।

ना कोई रिश्तों का बंधन , वो सच्ची प्रीत है
फिर महाभारत सा कोई, भीष्म आना चाहिये।।

इस जगत से मोह टूटे, श्रध्दा-भक्ति में लीन हो
बंधनो से मुक्ति सच्ची, ज्ञान ऐसा चाहिये ।।

Disclaimer ::

मैं कोई गीतकार, लेखिका या साहित्यकार नहीं बल्कि इक साधारण नारी हूँ। मैनें सदा दूसरों की अच्छाइयों को सराहने और उनसे कुछ ना कुछ सीखने की प्रेरणा पायी है। जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों ने मेरे अंदर के एक और रूप को बाहर लानें में मदद की है। अपनी कुछ रचनायेँ इस नये माध्यम (blog) के ज़रिये प्रस्तुत करना चाहती हूँ।

मेरे
लिखने की ना कोई भाषा है और ना ही कोई शैली हमेशा अच्छे से अच्छा ग्रहण करने की चाहत अवश्य रही है मैनें हर वर्ग हर जाति, धर्म, समाज और सबसे अधिक खुद पर लिखने की कोशिश की है सभी से अच्छा ग्रहण करने में कोई संकोच नहीं किया, किसी किसी अच्छे साहित्यकार की भाषा, शैली और मीटर पर अपने कुछ भाव संजोने की कोशिश की है

मैनें
मेरे आदर्श गीतकारों, गज़लकारों और साहित्यकारों की गागर में भरे शब्दों के सागर से कुछ बूँदें लेने की धृष्टता की है। मगर उनमें भाव, एहसास, दर्द सभी मेरे रहे हैं। कुछ ही गीत या कविताऍ ऐसी होंगी जिनमें उनकी शैली की झलक मिलेगी। अंजाने मे अगर पंक्तियॉ मेल खा गई होंगी तो वह इत्तेफ़ाकन हो सकता है। उनकी शैली मीटरमेल खा सकते हैं किन्तु रचनाओं मे जज़्बात, भाव, दर्द, वेदना, संवेदना अनुभूतियॉ मेरी मौलिक हैं।