Friday, 13 August 2010

फ़िर सभी पापी हृदय से, पाप तरना चाहिये
फ़िर नये आकाश से, गंगा उतरनी चाहिए ।।

कई युगों से क्षितिज का, एहसान बाकि है अभी
अब ज़मीं पर स्वर्ग को, नीचे उतरना चाहिये ।।

फ़िर सुनहरे पृष्ठ पर, भगवान का गुणगान हो
अब कोई गीता सी फ़िर, वाणी उपजनी चाहिये ।।

कलयुगी दानव प्रबल हो, कर रहे संहार हैं
कृष्ण के जैसा कोई, अवतार होना चाहि ।।

रोशनी अब खो गई, नभ के सितारों की कहीं
अब तिमिर में दीपों को जल जगमगाना चाहिये ।।

अब कहाँ सुर की हैं लहरें , कौन गाये लोरियाँ
अब तो बस मेंघों को मिल , मल्हार गाना चाहिये ।।

प्रीत की गंगा समर्पण मांगती है अब यहाँ
फिर बने मीरा कोई , श्याम सी प्रीत मिलना चाहिये ।।

ना कोई रिश्तों का बंधन , वो सच्ची प्रीत है
फिर महाभारत सा कोई, भीष्म आना चाहिये।।

इस जगत से मोह टूटे, श्रध्दा-भक्ति में लीन हो
बंधनो से मुक्ति सच्ची, ज्ञान ऐसा चाहिये ।।

No comments:

Post a Comment